जौनपुर जनपद (उ.प्र.) का समन्वित ग्राम्य विकास नियोजन
रोहित चैरसिया1 महीप चैरसिया2
1छात्र M.A., U.G.C.-N.E.T.½] ( भूगोल विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज (उप्र
2शोध छात्र (जे.आर.एफ.), भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी. काॅलेज, जंघई, जौनपुर (उप्र
*Corresponding Author E-mail: rohitchaurasia8182@gmail.com, mahipcharasia66@gmail.com
ABSTRACT:
समन्वित ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए नियोजन का अभिप्राय क्षेत्रीय ढांचे में कार्यात्मक संगठन के माध्यम से ग्रामीण जीवन में सुधार के लिए एक कार्य योजना की रूप रेखा तैयार करना होता है। प्रस्तुत शोध पत्र में स्थानिक-कार्यात्मक समन्वय के आधार पर ग्रामीण लोगों की सामाजिक-आर्थिक दशाओं के आधार पर ग्रामीण लोगों की सामाजिक-आर्थिक दशाओं को सुधारने के लिए एक व्यवस्था के रूप में अनुसंधान से संबंधित है। अध्ययन क्षेत्र जनपद जौनपुर अन्य जनपदों की भाँति भोजन, वस्त्र, गृह, शिक्षा तथा रोजगार जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। नियोजन के माध्यम से वर्तमान समय में एवं भविष्य में भी स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकतम् लोगों को लाभान्वित कर सम्पूर्ण ग्राम्य विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में ही प्रस्तुत शोध पत्र के अन्तर्गत समन्वित ग्राम्य विकास नियोजन का अध्ययन किया गया है। जिसके लिए द्वितीय तथा तृतीय स्रोत से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग एवं सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए क्षेत्र के भौतिक तथा सांस्कृतिक मानचित्रों व तालिकाओं का प्रयोग यथास्थान पर हुआ है। प्र्रस्तुत शोध पत्र व्याख्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक अनुसंधान पर आधारित है।
KEYWORDS: ग्रामीण विकास, नियोजन, विकास, अवस्थापनात्मक तत्व।
प्रस्तावना
समन्वित ग्रामीण क्षेत्रीय विकास का सम्बन्ध सन्तुलित ग्रामीण विकास की संकल्पना से सम्बन्धित है और यह बहुत जटिल एवं व्यापक संकल्पना है। नियोजकों एवं विद्वानों द्वारा इस संकल्पना को बहुत व्यापक रूप में वर्णित किया गया है। ‘समन्वित’ शब्द को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है (तिवारी. आर.सी. 2014)।
समन्वित शब्द का अर्थ क्रिया के रूप में ‘पूर्णरूपेण बनाना’ अथवा समग्रता का विचार है, जबकि विकास के सन्दर्भ में समन्वित शब्द दो प्रकार के समन्वय-स्थानिक एवं कार्यात्मक से सम्बन्धित होता है। स्थानिक समन्वय विभिन्न-विभिन्न कार्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग आदि की व्यवस्था है। इस प्रकार समन्वय से अभिप्राय स्थानिक ढाँचे में अर्थव्यवस्था एवं क्रियाकलापों के विभिन्न क्षेत्रों के भीतर सामंजस्य है। ‘ग्रामीण’ शब्द का अभिप्राय एक ऐसे क्षेत्र से होता है जहाँ पर अनगरीय जीवन तन्त्र, व्यवसायिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था एवं अधिवास प्रतिरूप पाया जाता है (सिंह. रवीन्द्र. 2009)। ग्रामीण क्षेत्र गाँवों अथवा मकानों का ऐसा क्षेत्र होता है जहाँ के अधिकांश निवासी कृषि व्यवसाय में संलग्न होते हैं। ‘विकास’ शब्द का अभिप्राय धनात्मक एवं मात्रात्मक के साथ ही साथ गुणात्मक परिवर्तन होता है (मिश्र. 1979)। ग्रामीण क्षेत्र के विकास के अन्तर्गत भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मौलिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित सुविधाओं के साथ ग्रामीण जीवन में सुधार निहित होता है। इस प्रकार के सुधारों का वास्तविक लाभ समाज में निर्धनों में निर्धनतम् को प्राप्त होना चाहिए। नियोजन का अर्थ तात्कालिक रूप से किसी कार्य अथवा कार्यों की श्रृंखला का निर्णय करना है जो कि सोद्देश्य एवं पूर्वानुमान से सम्बन्धित हों (अहमद. इनायत. 1965)। ऐसे विशिष्ट लक्ष्यों की व्यवस्था होती है जिसको नियोजन निश्चित समय की अवधि में पूरा करना चाहता है। इस प्रकार नियोजन को प्राविधिक एवं व्यवसायिक ज्ञान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका उपयोग निर्धारित सामाजिक वर्गों में संसाधन एवं आय के वितरण में सुधार के लिए किया जा सकता है।
अध्ययन क्षेत्र
जौनपुर जनपद, उŸारप्रदेष का एक प्रमुख ऐतिहासिक शहर है, यह वाराणसी प्रभाग के उŸार पष्चिमी भाग में स्थित है। इसका विस्तार 24024’छ से 26012’छ अक्षांष और 8207’म् से 8305’म् देषांतर के बीच है (चित्र-1)। गोमती और सई मुख्य नदियाँ हंै मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली, चिकनी बलुई है। जनपद में खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल 2038 वर्ग कि.मी. है। जौनपुर जिले की वास्तविक जनसंख्या 4,476,072 हैं, जिसमें 2,217,635 पुरूष तथा 2,258,437 महिला जनसंख्या है। जनसंख्या घनत्व 1113 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि.मी. है। साक्षरता 73.66 प्रतिषत है, जिसमें 86.06 प्रतिषत पुरूष तथा 61.7 प्रतिषत महिलाएँ साक्षर है। जिले में लिंगानुपात 1024 है जोकि भारत में 1000 पुरूषों पर 940 महिलाओं की तुलना में अधिक है। 93 प्रतिषत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जिनकी आजीविका का मुख्य साधन कृषि और कृषि आधारित उद्योग है।
चित्र - 1
चित्र - 2
शोध अध्ययन का उद्देष्य
1. समन्वित ग्रामीण विकास के कारकों का अध्ययन करना।
2. अध्ययन क्षेत्र में संसाधनों के उचित उपयोग हेतु नियोजन की स्थिति को ज्ञात करना।
3. ग्रामीण क्षेत्रों की विभिन्न समस्याएँ और प्रतिक्रिया आधारित सुझावों को प्रस्तावित करना।
आँकड़ा स्रोत तथा शोध विधि तंत्र
प्रस्तुत शोध पत्र व्याख्यात्मक और विष्लेषणात्मक अनुसंधान पर आधारित है। इसके अन्र्तगत पूर्व निर्धारित परिकल्पनाओं का तात्कालिक परिस्थितियों के संदर्भ में परीक्षण किया गया है। प्रस्तुत शोध पत्र में द्वितीयक एवं तृतीयक स्रोतों से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है। तथ्यों को स्पष्ट करने के लिये अध्ययन क्षेत्र का भौतिक एवं सांस्कृतिक मानचित्रों व तालिकाओं का प्रयोग किया गया है तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए जिला सांख्यिकीय पत्रिका 2018, राष्ट्रीय जनगणना 2011 तथा जिला हथकरघा कार्यालय व तहसील और विकासखण्ड कार्यालय से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है।
परिणाम एवं परिचर्चा
ग्रामीण विकास को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों को (प) भौगोलिक एवं पारिस्थितिकीय (पप) आर्थिक, (पपप) प्राविधिकीय, (पअ) सामाजिक- सांस्कृतिक एवं (अ) राजनैतिक-वर्गों में रखा जा सकता है (सिंह,1978)।
उपर्युक्त कारक न्यूनाधिक एक दूसरे के साथ-साथ अन्योन्य क्रिया करते हैं। भौगोलिक अथवा पारिस्थिकीय कारकों के अन्तर्गत अवस्थिति, जलवायु, वर्षा, मिट्टी आदि कारक सम्मिलित है। आर्थिक कारकों का सम्बन्ध संसाधनों का उचित एवं सर्वोत्तम उपयोग से होता है। पारम्परिक प्रविधियों के उपयोग उत्पादन के न्यून स्तर के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी रहे हैं। सामाजिक व्यवस्थायें एवं संस्थायें एवं उनमें मन्द गति से होने वाले परिवर्तन, नवोन्मेष एवं नवीन प्रविधियों को स्वीकार करने की अपेक्षाकृत क्रमों के सफलता एवं असफलता के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है। इसी प्रकार नियोजन के सन्दर्भ में विशेष रूप से राजनैतिक हस्तक्षेप विकास को बाधित करने वाला एक द्वितीय तत्व रहा है। इसी सन्दर्भ में अध्ययन क्षेत्र में विद्यमान समस्याओं के विश्लेषण का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही क्षेत्रीय क्षमता को ध्यान में रखते हुए समन्वित ग्रामीण क्षेत्रीय विकास के लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं।
कृषि विकास के लिए नियोजन
अध्ययन क्षेत्र में कृषि से सम्बन्धित मौलिक समस्याओं के अन्तर्गत समुचित ऋण सुविधाऐं, वर्षा की अनिश्चितता, सिंचन सुविधाओं का अपर्याप्त विकास, गांवों से बाजार की ओर कृषि उत्पादों को ले जाने की व्यवस्था की कमी आदि उल्लेखनीय है। उपर्युक्त समस्याओं के साथ-साथ भू स्वामित्व की सामाजिक व्यवस्था भी कृषि की दशाओं में पिछड़ेपन का एक कारण है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यक्रमों को कृषि विकास के सन्दर्भ में ग्रामीण क्षेत्रों के उत्थान के रूप में देखा जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र सीमित भूसंसाधन पर तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या का भार बढ़ता जा रहा है जबकि उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो रहा है। अध्ययन क्षेत्र में अगले दशक में विद्यमान जनसंख्या लगभग 1.2 गुनी हो जायेगी, अतः इस जनसंख्या के लिए अतिरिक्त खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। यद्यपि गेहूँ, धान एवं अन्य फसलों के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई है तथापि व्यापक पैमाने पर पारम्परिक कृषि के तरीकों के कारण प्रति इकाई उत्पादन संतोषजनक नहीं है। कृषि की वर्तमान प्राविधिकी मुख्य रूप से पूंजी के अधिकाधिक निवेश पर निर्भर है जिसमें सुनिश्चित सिंचाई के साधन अति आवश्यक हैं। सिंचाई सुविधाओं में विस्तार एवं रासायनिक उर्वरकों तथा उच्च उत्पादकता वाले बीजों आदि के बढ़ते उपयोग के परिणाम स्वरूप भूमि उपयोग प्रतिरूप में सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं तथापि अध्ययन क्षेत्र में अभी भी बहुत सी भूमि ऐसी है जिसका सदुउपयोग नहीं हो रहा है। भविष्य में अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी। वर्तमान समय में शुद्ध बोया गया क्षेत्र 276383 हे. तथा शुद्ध सिंचित क्षेत्र 241044 हे. (2016-17)। यहाँ उल्लेखनीय है कि अध्ययन क्षेत्र में बहुत कम भूमि पर जायद की फसलें एवं सब्जियाँ पैदा की जाती है। अतः अधिवासों के आस पास जहाँ सिंचाई की सुविधाऐं उपलब्ध हैं उपलब्ध कृषिगत भूमि को आलू, प्याज आदि फसलों के लिए अधिकाधिक उपयोग की जानी चाहिए जिससे अधिकाधिक आय प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार फसल चक्रण तथा जायद के अन्तर्गत मूंग एवं उर्द की कृषि के प्रसार द्वारा कृषि के वार्षिक उत्पादन में व्यापक रूप से वृद्धि हो सकती है। लघु एवं सीमान्त कृषकों को फसलों की आवश्यकता के समय सहकारी समितियों आदि के माध्यम से रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धि एवं आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। राजकीय प्रयोगशालाओं के माध्यम से मृदा परीक्षण कराकर उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप रसायनिक उर्वरकों के उपयोग की संस्तुति की जानी चाहिए। सुसिंचित क्षेत्रों हेतु रोग रहित उच्च उत्पादकता वाले गेहूँ, धान एवं दालों आदि के बीजों की आपूर्ति सुलभ होनी चाहिए। अध्ययन क्षेत्र सघन जनसंख्या वाला है और यहाँ जोत की इकाइयाँ अधिकांशतः छोटी हैं। कृषकों की वित्तीय दशा संतोषजनक नहीं है। आवश्यकता की अनेक फसलें थोड़ी मात्रा में ही पैदा की जाती हैं। अतः पाश्चात्य पद्धति पर आधारित कृषि व्यवस्था इस क्षेत्र के लिए उपयोगी नहीं है।
कृषि सम्बन्धी सहायक व्यवसायों का नियोजन
जनपद जौनपुर में सीमान्त एवं लघु कृषकों एंव भूमिहीन श्रमिकों, जो कुल कृषक जनसंख्या का 90 प्रतिशत से अधिक है को उनकी वर्तमान आय में वृद्धि हेतु सहायक व्यवसायों को करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में दुग्ध उद्योग के व्यवसाय पर बल दिया जाना चाहिए, जिसके लिए संकर नस्ल की भैंसों एवं गायों, उनके उपचार हेतु औषधि एवं डाक्टरों की सुविधा तथा उपलब्ध दुग्ध के विक्रय हेतु संग्रह केन्द्र की व्यवस्था की जानी चाहिए। पोषक खाद्य के प्रति लोगों की बढ़ती सजगता के परिणामस्वरूप मुर्गे एवं अण्डों की मांग तीव्र गति से बढ़ रही है अतः लघु एवं सीमान्त कृषकों के मध्य मुर्गी पालन को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसी प्रकार, निर्धन परिवारों एवं सीमान्त कृषकों को भेड़, बकरी, सूअर आदि पालने के लिए आर्थिक सहायता के माध्यम से प्रेरित किया जाना चाहिए। जनपद में अनेक भूभाग कृषिगत इसलिए नहीं है कि वहाँ पर वर्ष पर्यन्त पानी लगा रहता है। ऐसे भूभागों में मत्स्य पालन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस प्रकार कृषि से सम्बन्धित सहायक व्यवसायों का विकास जहाँ एक ओर भूमि पर जनसंख्या के दबाव को कम करने में सहायक होंगे वहीं दूसरी ओर यहाँ के लोगों के रहन-सहन के स्तर में आय बढ़ने के कारण वृद्धि करने में सहायक हांेगे।
औद्योगिक विकास हेतु नियोजन
जनपद जौनपुर में अभी तक विशाल उद्योग का बिलकुल अभाव है यहाँ पर कुल कार्यशील जनसंख्या का मात्र 1.07 प्रतिशत उद्योग में संलग्न है। यह एक तथ्य है कि यहाँ की ग्रामीण क्षेत्र की बढ़ती हुई बेरोजगार जनसंख्या को न तो कृषि और न उपलब्ध उद्योगों में ही पूर्णरूपेण रोजगार मिल सकते हैं। ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या का समाधान व्यापक रूप से तैयार किये गये विकेन्द्रीकृत उद्योगों की व्यापक रूप से तैयार की गयी योजना द्वारा ही सम्भव है। यही नहीं, इस योजना के क्रियान्वयन एवं उसकी समीक्षा भी ईमानदारी से होती रहनी चाहिए। खनिज से संसाधनों के अभाव में जनपद में बड़े पैमाने के उद्योगों की विकास की सम्भावना बहुत थोड़ी है। अतः ग्राम्य, कुटीर एवं छोटे पैमाने के उद्योगों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाना चाहिए। कृषि एवं उसके सहायक व्यवसायों से सम्बन्धित उद्योगों के विकास के द्वारा यहाँ के लोगों के आर्थिक उत्थान की व्यापक सम्भावना है। यहाँ पर लोगों को अतिरिक्त आय प्रदान करने हेतु अग्रलिखित उद्योग का विकास किया जाना चाहिए- क. शीत संग्रहालय, ख. तेल निकालने वाले संयंत्र, ग. खाद्य प्रसंस्करण, घ. फल संरक्षण एवं ङ. बाध एवं रस्सी बनाना आदि। कृषि में मशीनों का अधिकाधिक प्रयोग होने के परिणामस्वरूप उनके रखरखाव एवं सुधार के लिए अतिरिक्त रोजगार की सम्भावनायें पैदा होंगी जिसके लिए कृषि सेवा केन्द्र उद्योग, खाद उद्योग, अतिरिक्त कलपुर्जा का निर्माण आदि का विकास हो सकेगा। उपरोक्त उपायों के साथ-साथ ग्राम्य शिल्प, कुटीर एवं सेवाओं से सम्बन्धित उद्योगों का विकास भी अति आवश्यक है। इस प्रकार के उद्योगों में जहाँ एक ओर पंूजी की बहुत अति आवश्यक होगी वहीं दूसरी ओर लोगों को रोजगार प्राप्ति की सम्भावनाऐं बढ़ जायेंगी। इस वर्ग में (क) हथकरघा बुनाई (ख) बुनाई मीलें (ग) कालीन बुनाई (घ) लोहे के बक्से, बाल्टियाँ आदि (ङ) साबुन निर्माण (च) मोमबत्ती एवं अगरबत्ती (छ) चिराई मीलें (ज) बांस पर आधारित व्यवसाय (झ) जूता निर्माण, सुधार एवं चर्म उद्योग का विकास उल्लेखनीय है।
सेवा केन्द्र नियोजन
सेवा केन्द्र की संकल्पना जो कि सामाजिक आर्थिक-क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण के विचार पर आधारित है। ग्रामीण क्षेत्रों के सन्तुलित विकास स्थान और विशिष्ट अवस्थिति के मध्य कार्यात्मक अन्र्तसम्बन्धों पर आधारित है जिससे वाह्य परिधि पर स्थित क्षेत्रों का विकार भी सम्भव हो सके। इस प्रकार इसके अन्तर्गत भूमि सुधार, निवेशों की वृद्धि, उपयुक्त प्राविधिकी के उपयोग आदि के द्वारा कृषि प्रखण्ड के विकास के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योग सहित विशेष रूप से कुटीर एवं छोटे पैमाने के उद्योगों का विकास सम्मिलित हैं। यही नहीं, इसके अन्तर्गत पर्यावरण सुधार, शिक्षा, परिवहन, सांस्कृतिक एवं अन्य सामाजिक कल्याण कार्यक्रम भी सम्मिलित हैं। सेवा केन्द्रों के चुनाव को वहाँ वरीयता दी जानी चाहिए जहाँ अनेक प्रकार की सामाजिक-आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र हो। इस प्रकार इस समस्या के अन्तर्गत अवस्थितिक एवं कार्यात्मक अन्तरालों की पहचान, स्थानिक समन्वय एवं कार्यात्मक सहयोग के प्रतिरूप तथा नवीन केन्द्रीय स्थान तन्त्र के लिए नियोजन सम्मिलित हैं।
सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं हेतु नियोजन
सामाजिक-आर्थिक सेवा केन्द्रों की स्थापना जनपद में स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए निकटतम दूरी पर होनी चाहिए। जनपद में संसाधन सीमित हैं और संस्थागत अध्ययन क्षेत्र में योजनाओं के विकास की गति और पहँुच बहुत कम है। इस प्रकार जनपद के सीमित संसाधन आधार का देखते हुए विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों तथा कृषकों की आर्थिक दशाओं को सुधारने के लिए कार्यक्रम प्रस्तावित किये गये हैं। यद्यपि अध्ययन क्षेत्र की समस्यायें असीमित हैं तथापि उनमें से अधिकांश को स्थानीय जनसहयोग एवं लोगों की सक्रिय भागीदारी से सुझलाया जा सकता है, जिससे अध्ययन क्षेत्र का समन्वित ग्रामीण विकास संभव हो सके।
निष्कर्ष
जनपद जौनपुर की 92.3 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जिसमें से कुल कार्यशील जनसंख्या का 68 प्रतिशत लोग कृषि कार्य में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुये हैं। क्षेत्र की आजीविका का मुख्य आधार कृषि और कृषि आधारित उद्योग है। उच्च जीवन स्तर के विभिन्न मानकों पर क्षेत्र पिछड़ेपन की स्थिति में है। अध्ययन क्षेत्र में कृषि विकास, औद्योगिक विकास, अवस्थापनात्मक तत्व व सामाजिक विकास के सेवा केन्द्रों में अनियमितता है। अध्ययन क्षेत्र में सेवा केन्द्र और ग्रामीण विकास में धनात्मक सहसम्बन्ध दिखाई पड़ता है। अध्ययन क्षेत्र के निवासियों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को उन्नत करने के लिए कृषि में सुधार आवश्यक है। यद्यपि जनपद में पंचवर्षीय योजनाओं, हरित क्रांति व संस्थागत योजनाओं के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है। जनपद में कृषिगत नवाचार अपनाने तथा सरकारी योजनाओं से लाभ प्राप्त करने की दर बहुत धीमी है। इस क्षेत्र में किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है। जौनपुर जनपद में सर्वाधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु वर्ग की है। इन युवाओं में कौशल का अभाव है। अधिकांश लोग पारिवारिक कृषि में तथा छिपी बेरोजगारी के रूप में कृषि और लघु उद्य़ोगों में लगे हैं। यदि इनमें उचित कौशल प्रशिक्षण तथा प्रबंधकीय गुण विकसित किया जाए तो कृषि को व्यावसायिक रूप दिया जा सकता है तथा उत्पादन लागत को कम कर उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। कृषि और कृषि आधारित उद्योगों में विविधता तीव समावेषी ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करने का आधार होता है।
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Received on 20.02.2021 Modified on 09.03.2021
Accepted on 21.03.2021 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2021; 9(1):13-17.